श्रावण मास की पावन चेतना जब चारों ओर प्रवाहित होती है, तब मन में महादेव के समीप पहुँचने की तीव्र उत्कंठा जगती है। भगवान शिव की आराधना केवल बाह्य उपचारों तक सीमित नहीं है, अपितु उनके महाप्रसाद *‘रुद्राक्ष’* को आत्मसात करने में निहित है।यह आलेख रुद्राक्ष की महिमा, उसकी पौराणिक उत्पत्ति, वास्तु प्रभाव और वैज्ञानिक महत्त्व को जन-जन तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है।रुद्राक्ष की महिमा एवं शास्त्रोक्त संदर्भ,शिव पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में रुद्राक्ष को साक्षात ‘शिव का अंश’ माना गया है। शास्त्रों में इसकी महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है:रुद्राक्षधारणं श्रेष्ठं न तत्सममुरुप्रियम्।पवित्रं पावनं नित्यं पापहरमुत्तमम्॥आगे पढ़ें……

शास्त्रीय एवं पौराणिक उत्पत्ति का रहस्य:पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब त्रिपुरारी महादेव ने संसार के कल्याण हेतु सहस्र वर्षों तक समाधि ली और नेत्र खोले, तो उनके नयनों से जल की कुछ बूंदें पृथ्वी पर गिरीं। उन्हीं दिव्य अश्रु-बिंदुओं से ‘रुद्राक्ष’ के वृक्षों की उत्पत्ति हुई।रुद्राक्ष का सूक्ष्म ऊर्जात्मक एवं जैविक विश्लेषणरुद्राक्ष केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक उच्च-स्तरीय ‘जैविक-विद्युतीय ऊर्जा संतुलक’ है:विद्युत-चुंबकीय ध्रुवता:रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से परा-चुंबकीय गुण पाए जाते हैं। जब यह त्वचा के स्पर्श में आता है, तो शरीर के विद्युतीय प्रवाह को संतुलित करता है, जिससे नाड़ी संस्थान शांत होता है।चक्र-संतुलन:मानव शरीर के सूक्ष्म ऊर्जा केंद्रों (विशेषकर अनाहत/हृदय चक्र और विशुद्ध/कंठ चक्र) की अवरुद्ध ऊर्जा को मुक्त करने में रुद्राक्ष अद्भुत कार्य करता है।रक्त-संचालन नियंत्रण::यह शरीर के रक्त संचार की गति को नियंत्रित कर मन को अंतर्मुखी और ध्यान-योग्य बनाता है।आगे पढ़ें……

वास्तु शास्त्र एवं गृह-प्रांगण हेतु विशिष्ट प्रयोग:गृहस्थ जीवन में वास्तु दोषों के निवारण के लिए रुद्राक्ष का उपयोग एक अचूक रक्षा-कवच का काम करता है।शास्त्रों में गृह-प्रांगण में रुद्राक्ष की महिमा बताते हुए कहा गया है:रुद्राक्षपूजितं गेहं यत्र तिष्ठति भामिनि।तद्गेहं सर्वपापेभ्यो मुक्तं भवति सर्वदा॥मुख्य द्वार की नकारात्मकता::घर के मुख्य द्वार पर 108 मनकों की पंचमुखी रुद्राक्ष माला को तांबे के तार में पिरोकर टांगने से किसी भी प्रकार की कुदृष्टि, तंत्र-दोष या नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती।ईशान कोण का शोधन:यदि पूजा स्थान या ईशान कोण में वास्तु दोष हो, तो वहाँ जल से भरे पात्र में 5 मुखी रुद्राक्ष रखें और उस जल का प्रतिदिन पूरे घर में छिड़काव करें। इससे गृह-कलह शांत होती है।आगे पढ़ें…….

दिशा-आधारित रुद्राक्ष उपचार:सूर्य (पूर्व दिशा दोष): 1 मुखी या 12 मुखी रुद्राक्षचंद्र (उत्तर-पश्चिम दोष): 2 मुखी रुद्राक्षमंगल (दक्षिण दिशा दोष): 3 मुखी रुद्राक्षशनि (पश्चिम दिशा दोष): 7 मुखी या 14 मुखी रुद्राक्ष।मुखी विधान एवं ग्रह-कृपाएक मुखी (सूर्य): साक्षात् शिव स्वरूप; आत्म-साक्षात्कार, नेतृत्व क्षमता व सूर्य-कृपा हेतु शुभ।त्रिमुखी (मंगल): पावक (अग्नि) स्वरूप; आलस्य, मानसिक ताप और रक्त विकारों का नाशक।पंचमुखी (बृहस्पति): कालाग्नि रुद्र स्वरूप; बुद्धि, विवेक व मानसिक एकाग्रता हेतु सर्व-सुलभ।सप्तमुखी (महालक्ष्मी/शनि): अनंग व महालक्ष्मी स्वरूप; दरिद्रता का उन्मूलन और शनि बाधा से मुक्ति।एकादश मुखी (हनुमान जी): एकादश रुद्र स्वरूप; अकाल मृत्यु से सुरक्षा, अभय-दान व आध्यात्मिक उन्नति।धारण हेतु शास्त्रोक्त नियम एवं मर्यादाएँरुद्राक्ष अत्यंत संवेदनशील ऊर्जा-पुंज है, इसलिए इसके पूर्ण लाभ हेतु नियमों का पालन आवश्यक है ।सिद्धि एवं प्राण-प्रतिष्ठा:श्रावण मास के सोमवार या शिवरात्रि को रुद्राक्ष को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर ‘ॐ नमः शिवाय’ अथवा ‘महामृत्युंजय मंत्र’ से 108 बार अभिमंत्रित करके ही धारण करें।धारित रुद्राक्ष की मर्यादा:* जन्म-मरण के सूतक के समय या श्मशान यात्रा के दौरान रुद्राक्ष को उतारकर शुद्ध स्थान पर रख देना चाहिए।आहार शुद्धि: इसे धारण करने वाले साधक को मांस, मदिरा व अन्य तामसिक पदार्थों का पूर्ण त्याग करना चाहिए।धागा एवं धातु: रुद्राक्ष को सदैव लाल, पीले सूती/रेशमी धागे में, या चांदी/स्वर्ण के तार में ही धारण करें। काले धागे के प्रयोग से बचें।न रुद्राक्षसमो मन्त्रो न रुद्राक्षसमं तपः।*न रुद्राक्षसमं ज्ञानं न रुद्राक्षसमा गतिः॥श्रावण के इस पावन मास में नियमबद्ध होकर रुद्राक्ष धारण करें और अपने जीवन व गृह-प्रांगण को महादेव की अलौकिक ऊर्जा से अभिसिंचित करें।
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