भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए भक्त उन्हें जल, दूध, धतूरा और भांग जैसी अनेकानेक प्रिय वस्तुएं अर्पित करते हैं। परंतु इन सब में त्रिदल बिल्व पत्र का एक विशेष और अत्यंत पावन स्थान है। त्रिदल बिल्व पत्र एक साधारण सा तीन पत्तियों वाला पत्र भगवान आशुतोष को इतना प्रिय क्यों है, ताप और तृषा का शमन समुद्र मंथन की अवधि में जब जगत्-कल्याण के लिए महादेव ने हलाहल विष का पान किया, तब विष की प्रचंड उष्णता से उनका कंठ, मस्तक और संपूर्ण शरीर तपने लगा। उस तीव्र दाह को शांत करने के लिए देवताओं और ऋषियों ने प्रभु पर जल, भांग, धतूरा और तासीर में अत्यंत शीतल बिल्व पत्र अर्पित किए। अपने औषधीय और आध्यात्मिक गुणों के कारण बिल्व पत्र उस दाह को शांत करने में सर्वाधिक सहायक सिद्ध हुआ। इसी शीतलता से प्रसन्न होकर महादेव ने बिल्व पत्र को सदैव के लिए अपना अति-प्रिय माध्यम स्वीकार कर लिया।आगे पढ़ें त्रिदल में त्रिगुण का संतुलन…..

त्रिदल में त्रिगुण का संतुलन:बिल्व पत्र की तीन पत्तियां हमारे तीन गुणों—सत्, रज और तम का प्रतीक हैं। जब हम इसे महादेव पर अर्पित करते हैं, जिससे भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि हम अपने भीतर के विकारों को शांत कर संतुलन और पवित्रता की ओर बढ़ते हैं।सनातन धर्म के प्रमुख शास्त्रों और पुराणों में बिल्व पत्र की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है–शिव पुराण –: शिव पुराण के अनुसार, बिल्व पत्र महादेव का साक्षात रूप माना गया है। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि जो भक्त भक्तिभाव से महादेव को एक भी बिल्व पत्र अर्पित करता है, उसे कोटि कन्यादान और अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।स्कंद पुराण में बिल्व वृक्ष की उत्पत्ति भगवती पार्वती के पसीने की बूंद से बताई गई है, जिस कारण इसके मूल में गिरजा, तने में माहेश्वरी, शाखाओं में दक्षायणी और पत्तियों में पार्वती का वास माना गया है। इसी पुराण में यह भी कहा गया है कि यदि नया बिल्व पत्र उपलब्ध न हो, तो पहले से चढ़े हुए बिल्व पत्र को जल से धोकर पुनः शिवजी को अर्पित किया जा सकता है।अहंकार और विकारों का त्याग:बिल्व पत्र की तीन पंखुड़ियां काम, क्रोध और लोभ के त्याग की सूचक हैं। जब आप श्रद्धा से एक भी बिल्व पत्र अर्पित करते हैं, तो वास्तव में आप अपना अहंकार और समस्त मानसिक भार प्रभु के श्रीचरणों में सौंप देते हैं। ये तीन पत्तियां त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) के साथ-साथ भगवान शिव के त्रिनेत्र को दर्शाती हैं। इसे अर्पित करने का अर्थ अपनी तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) को प्रभु की भक्ति में समर्पित कर देना है। आगे पढ़ें आत्मिक अनुभूति….

आत्मिक अनुभूति जब आप श्रावण के पावन मास में पूर्ण श्रद्धा से एक कोमल बिल्व पत्र शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, तो वह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं रह जाती। उस क्षण मन की चंचलता शांत हो जाती है और चित्त सीधे महादेव के ध्यान में लीन हो जाता है।बिल्व पत्र का स्पर्श और “ॐ नमः शिवाय” का निर्मल स्मरण साधक के भीतर एक गहरी आत्मिक शांति, भक्ति और संतोष का भाव भर देता है।
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