उत्तराखण्ड

रक्षा बंधन के दिन मनाए जाने वाला,सांस्कृतिक परंपरा को संजोए बग्वाल मेला 

रेनू सत्यपाल चंपावत। उत्तराखंड में चंपावत जनपद के ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड मैदान में अनूठी सांस्कृतिक परंपरा को संजोए हुए हर वर्ष  23 से 31अगस्त को आषाढ़ी कोथिक मेले का आयोजन किया जाता है।रक्षा बंधन के दिन बग्वाल मेले का आयोजन होता है।जिसमे आस-पास के गांवों के सैकङो ग्रामीण अपने जाति समूहों की सेनाएं गठित कर सम्मलित होते हैं। इसे कत्यूर शासन का पारंपरिक त्यौहार भी कहा जाता है।मेले के दिन समूह एक दूसरे पर पत्थर फेंकते थे।लेकिन अब पत्थरों की जगह फूलों ने ले ली है।राज्य सरकार द्वारा अब बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित कर दिया गया है।आगे पढ़ें

बग्वाल मेले की मान्यता।मान्यताओं के अनुसार किसी समय देवीधुरा के सघन वन में बावन हजार वीर और चौसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से प्रतिफल के रूप में नर बलि की मांग की। जिसके लिए निश्चित किया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के रक्त के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जाएगा और यह प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी चंदवंशी राजाओं के परामर्शदाता मेहरा व फर्त्याल जातियों द्वारा चंदशासन तक यहां इस दिन नर बलि दी जाती थी।लेकिन धीरे धीरे मेले का स्वरूप बदल गया और अब पत्थरो की जगह एक दूसरे पर फूल फेंके जाते है।आगे पढ़ें

परंपरागत बग्वाल पूजन विधान।मेले के पूजन अर्चन का कार्यक्रम विशेष रूप से श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि तक परंपरागत पूजन होता है।बग्वाल के लिए सांगी पूजन एक विशिष्ट प्रक्रिया के साथ संपन्न किया जाता है ।जिसे चारों खाम ( चम्याल,गहडवाल,लमगड़िया,और वालिग) द्वारा संपन्न किया जाता है,फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं।आगे पढ़ें

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बग्वाल का स्वरूप।महरा और फर्त्याल जाति के लोगो की टोलियां ढोल नगाड़ों के साथ रिंगाल की बनी हुई छतरी जिसे छन्तोली कहते हैं के साथ अपने अपने गावों से भारी जोश उल्लास के साथ मंदिर प्रांगण में पहुंचते हैं ।पारंपरिक संस्कृति के साथ सिर पर कपड़ा बांध हाथो में लट्ठ तथा फूलों से सजा फर्रा छन्तोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं। बग्वाल खेलने वालों को द्योके कहा जाता है।द्यौके के अपने अपने घरों से महिलाएं आरती उतार आशीषबचन और तिलक चंदन लगाकर हाथ में पत्थर देकर ढोल नगाड़े के साथ बग्वाल के लिए भेजती हैं।इनका मार्ग पूर्व निर्धारित होता है ।मैदान पहुंचने का स्थान व दिशा हर खाम की अलग अलग होती है।उत्तर की ओर से बालिग और पूर्व की ओर से गहड़वाल मैदान में आते हैं ।दोपहर तक चारों खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिणी द्वार से बाहर निकलती है।फिर दो दलों में विभक्त होकर दिन तक पुजारी द्वारा बग्वाल का उद्घोष होता है ।इसी के साथ खामो के प्रमुखों की अगवाई में दोनो ओर से पत्थरों की वर्षा होती है।काफी देर युद्ध के बाद पुजारी को अंत करण से विश्वास हो जाता है की एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा तब वह तांबे के छत्र और चंबर के साथ मैदान में आकर बग्वाल संपन्न होने की घोषणा करते है।

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